|
ردیف |
شماره مجله |
شماره صفحه |
عنوان مطلب |
نویسنده |
توضیحات |
|
209 |
19 10/1378 |
3 |
زمان بهسرعت میگذرد |
تورج ژوله |
سرمقاله |
|
210 |
" |
4 |
قالیهای باغی از نگاه کورت اردمان |
- |
قسمت اول |
|
211 |
" |
10 |
صادرات فرشهای افغانستان از پاکستان |
- |
- |
|
212 |
" |
14 |
کریگ کیل بورگر، نوجوان 15 سالهای که با اشتغال بهکار کودکان مبارزه میکند |
سیما مقتدر |
- |
|
213 |
" |
18 |
اسطوره و نشانهشناسی در ارتباط با فرشهای شرقی |
جاتین کیستی |
- |
|
214 |
" |
24 |
بافنده کرد، نقاش ذهن خویش |
مسعود رحیمی |
معرفی کتاب |
|
215 |
" |
24 |
از زبان داریوش |
خانم پروفسور هاید ماری کخ ترجمه: پرویز رجبی |
معرفی کتاب |
|
216 |
" |
25 |
بررسی قالی و گلیمبافی در بیجار |
روشنک نقیب حضرتی |
معرفی پایاننامه |
|
217 |
" |
25 |
بررسی قالی و قالیچههای شمایلی ایران |
مریم قاسمی اندرود |
معرفی پایاننامه |
|
218 |
" |
27 |
پرچم قشقایی |
ناصر خانبازی |
- |
|
219 |
20 و 21 11و12/78 |
3 |
سرمقاله |
تورج ژوله |
- |
|
220 |
" |
4 |
مؤلفههای جنبی |
تورج ژوله |
- |
|
221 |
" |
9 |
گلیم، دستبافتهای زیبا حتی برای زندگی امروز |
- |
قسمت دوم (گلیم روی دیوار) |
|
222 |
" |
14 |
نگاهی به تجارت فرش و یادی از بزرگان فرش همدان |
- |
- |
|
223 |
" |
18 |
تحولاتی جدید در فرش افغانستان |
تورج ژوله |
همراه با نقطه نظرات حبیب امینی |
|
224 |
" |
20 |
رمزهای زنده جان |
مونیک دوبوکور ترجمه:جلال ستاری |
معرفی کتاب |
|
225 |
" |
20 |
سکاها |
تامارا تالبوت رایس ترجمه: رقیه بهزادی |
معرفی کتاب |
|
226 |
" |
21 |
معرفی یک پیشکسوت |
آزیتا مقدسی سرابی |
استاد اسدالله وثوقی ایرانی |
|
227 |
" |
22 |
رنگ در فرش |
احمد دانشگر |
از فرهنگ جامع فرش ایران |
|
228 |
22 و 23 1و 2/79 |
3 |
صادرات فرش به آمریکا و تعمقی در واقعیات |
تورج ژوله |
سرمقاله |
|
229 |
" |
5 |
دومین مسابقه طرحها و نقشههای فرش دستباف ایران |
- |
وزارت جهاد سازندگی برگزار میکند |
|
230 |
" |
7 |
رونالد بریک، طاح مشهور آمریکا و دیدگاههای او برای تزیین خانه با فرش |
- |
- |
|
231 |
" |
10 |
فرش جنگ، روایتی از سالهای تیره و غمانگیز جنگ در افغانستان |
گروه تحقیق و پژوهش |
- |
|
232 |
" |
14 |
رنگرزی گیاهی، ویژگیها و راهکارها |
حسین حسنی |
- |
|
233 |
" |
18 |
تاریخچه صنایع نساجی کرمان |
عذری خزائلی |
- |
|
234 |
" |
26 |
مانندگی اسطورههای ایران و چین |
جی. سی. کویاچی ترجمه: دکتر کوشیار کریمی طاری |
معرفی کتاب |
|
235 |
" |
26 |
حدودالعالم من المشرق الی المغرب |
به کوشش: دکتر منوچهر ستوده |
معرفی کتاب |
|
236 |
" |
27 |
نگاهی به عملکرد اداره فرش وصنایع دستی جهاد سازندگی استان فارس |
- |
- |
|
237 |
24 3/1379 |
3 |
نقشمایهها و فرهنگ مردم |
تورج ژوله |
سرمقاله |
|
238 |
" |
4 |
گلیم، دستبافتهای زیبا حتی برای زندگی امروز |
- |
قسمت سوم (استفادههای غیر متداول از گلیم) |
|
239 |
" |
12 |
احیای یک فرهنگ کهن فرشبافی در مراکش |
گروه تحقیق و پژوهش |
فرشهای آیت خوزهما |
|
240 |
" |
18 |
قیمتهای جدید پایه، جهت اخذ پیمان انواع فرش دستباف |
- |
- |
|
241 |
" |
20 |
احیای نقوش فرش فارس |
ناصر خانبازی |
احیای دستبافتههای لری منطقه ممسنی |
|
242 |
" |
22 |
فرش پاکستان + موفقیت |
یعقوب صالحجی |
- |
|
243 |
" |
28 |
ایران عصر صفوی |
راجر سیوری ترجمه:کامبیز عزیزی |
معرفی کتاب |
|
244 |
" |
28 |
تاریخ صنایع ایران، بعد از اسلام |
زکی محمد حسن ترجمه: محمدعلی خلیلی |
معرفی کتاب |
|
245 |
" |
24 انگ |
فرشهای دکوراتیو و قدیمی |
- |
تصویر |
|
246 |
25 4/1379 |
3 |
فرش، مطبوعات، مسؤولین |
تورج ژوله |
سرمقاله |
|
247 |
" |
4 |
ششه درمه (بافتههای سیاه و سفید ایران) |
پرویز تناولی |
آشنایی با گروهی دیگر از دستبافتههای عشایری ایران |
|
248 |
" |
10 |
تاریخ رنگ و رنگرزی در ایران و نمونهای از رنگزاهای ایران |
احمد دانشگر |
- |
|
249 |
" |
15 |
هنر فرش، نزد ایرانیان بود و بس |
تورج ژوله |
- |
|
250 |
" |
16 |
ارتباطات مفید، گروه فرش تاپتن و شرکت صادرات قالی (میری) |
گروه تحقیق و پژوهش |
- |
|
251 |
" |
20 |
هشتمین نمایشگاه فرش دستباف ایران (ارزیابی عملکرد از دید بازدیدکنندگان) |
- |
گزارش تفصیلی |
|
252 |
" |
26 |
دومین مسابقه طرحها و نقشههای فرش دستباف ایران |
- |
گزارش |
|
ردیف |
شماره مجله |
شماره صفحه |
عنوان مطلب |
نویسنده |
توضیحات |
|
153 |
13 4/1378 |
2 |
نگرانیها در معاملات بازار داخلی |
تحریریه قالی ایران |
سرمقاله |
|
154 |
" |
4 |
فرش دستباف و موقعیت بینالمللی دموتکس |
گروه پژوهش |
قسمت اول |
|
155 |
" |
6 |
بررسی نظرخواهی از شرکتکنندگان در نمایشگاه دموتکس 1999 |
- |
- |
|
156 |
" |
8 |
نقوش گل و بوته با الهام از طبیعت... (2) |
هانین هگن بارت |
ترجمه: رضا کرم افروز |
|
157 |
" |
12 |
فرش دستبافت، بررسی تولید، صادرات و بازار جهانی |
علی دنیا دیده |
قسمت اول |
|
158 |
" |
16 |
عرفان در فرش |
محمد حیدری دلگرم |
قسمت چهارم |
|
159 |
" |
19 |
وفاداری، منش مرحوم صیامدوست بود |
تحریریه قالی ایران |
تسلیت برای سید علی اکبر سید صیامدوست |
|
160 |
" |
20 |
فرصتالدوله شیرازی و قالیچه موزه فرش ایران |
ابوالفضل وکیلی |
- |
|
161 |
" |
23 |
بازبافی بینظیرترین و گرانبهاترین فرش جهان |
- |
قالی شیخ صفی |
|
162 |
" |
24 |
با تار و پود عشق (گبهها و قالیهای عشایری فارس) |
محمد صادق فسایی |
- |
|
163 |
" |
26 |
قالی دیروز |
- |
قالی گرایی |
|
164 |
" |
28 |
قالی امروز |
- |
کناره شیری گوزنی و کناره تخت جمشیدی |
|
165 |
14 5/1378 |
2 |
محوریت نمایشگاه بزرگ فرش |
تحریریه قالی ایران |
سرمقاله |
|
166 |
" |
4 |
نمایشگاه بزرگ فرش و آیندهای پر تلاش |
گروه پژوهش و تحقیق |
تحلیلی از هفتمین نمایشگاه بزرگ فرش ایران |
|
167 |
" |
14 |
دستبافهای افشاری در فراز و نشیب تاریخ |
- |
قسمت دوم |
|
168 |
" |
20 |
دنیا در فرش |
علی اکبر پور طارم |
مصاحبه |
|
169 |
" |
26 |
فرش دستبافت، بررسی تولید، صادرات و بازار جهانی |
علی دنیا دیده |
قسمت دوم |
|
170 |
" |
30 |
سیل، قالی و زندگی (دار قالی برجاست، ولی قالیباف نیست) |
- |
گزارش ویژه |
|
171 |
" |
33 |
نقش قالی |
- |
شعر |
|
172 |
15 و 16 6و7/78 |
2 |
بازارهای جدید فرش |
تحریریه قالی ایران |
سرمقاله |
|
173 |
" |
4 |
هشتمین نمایشگاه بزرگ فرش «تجربه ای جدید» |
- |
گزارش ویژه |
|
174 |
" |
8 |
فرش دستبافت، بررسی تولید، صادرات و بازار جهانی |
علی دنیا دیده |
قسمت سوم |
|
175 |
" |
12 |
گذری بر روند نمایشگاه فرش اویرتفا |
- |
نورنبرگ 1999 |
|
176 |
" |
16 |
فرش دستباف و موقعیت بینالمللی دموتکس |
گروه پژوهش |
قسمت دوم |
|
177 |
" |
20 |
فرهنگ جامع فرش ایران |
احمد دانشگر |
مصاحبه (قسمت اول) |
|
178 |
" |
26 |
پاسخ گبه خانم رسید |
کلمنس آگوست اشپیکرمن (آلمان) |
- |
|
179 |
17 8/1378 |
2 |
سرمقاله |
تورج ژوله |
- |
|
180 |
" |
4 |
کودکان و فرشبافی |
- |
گزارش |
|
181 |
" |
6 |
مبارزه علیه کار کودکان پیروز میشود |
علی تقی (پاکستان) |
سخنرانی |
|
182 |
" |
8 |
بازار فرش فرانسه از نگاه کارشناسان فرش پاکستان |
- |
- |
|
183 |
" |
14 |
فرش بزرگ مرکز اسلامی هامبورگ |
- |
از نگاه ماهنامه آلمانی زبان هایمتکس |
|
184 |
" |
16 |
تقلید از فرشهای ایرانی و راه های مقابله با آن |
محمد علمی |
- |
|
185 |
" |
21 |
نامه سرگشاده به وزارت فرهنگ و ارشاد اسلامی |
کلمنس آگوست اشپیکرمن |
جامعه بینالمللی کار |
|
186 |
" |
22 |
فرهنگ جامع فرش ایران |
فاطمه عرب |
قسمت دوم |
|
187 |
" |
24 |
فرش دستباف و موقعیت بینالمللی دموتکس |
گروه پژوهش |
قسمت سوم |
|
188 |
" |
30 |
اثری از یک بافنده هنرمند گیلانی |
- |
قالیچه پیک صلح |
|
189 |
" |
31 |
تکمیل فرآوردههای نساجی و رنگرزی (جلد دوم) |
مرتضی سهیزاده ابیانه |
معرفی کتاب |
|
190 |
" |
31 |
رنگ و طبیعت (دانش رنگها) |
مهندس ناصر فرزان |
معرفی کتاب |
|
191 |
" |
32 |
گذری بر رنگینههای طبیعی |
جواد فروغی |
روناس |
|
192 |
" |
35 |
جایگاه فرش ایران در یونان |
- |
- |
|
193 |
" |
36 |
فرشهای ایرانی در موزههای آلمان |
پرنیان امرآبادی |
معرفی پایاننامه |
|
194 |
" |
36 |
بررسی قالیبافی در هریس |
فریبا افتخاری |
معرفی پایاننامه |
|
195 |
" |
37 |
اکسپو 2000 در انتظار 40 میلیون بازدیدکننده |
- |
گزارش |
|
196 |
18 9/1378 |
5 |
نویدی دیگر |
تورج ژوله |
سرمقاله |
|
197 |
" |
7 |
قالی بزرگ مرکز اسلامی هامبورگ |
- |
- |
|
198 |
" |
11 |
نامه رسیده از یک کاردان فرش |
سعدی مؤثقی |
|
|
199 |
" |
12 |
گلیم، دستبافتهای زیبا حتی برای زندگی امروز |
- |
قسمت اول |
|
200 |
" |
16 |
چین، تولیدکنندهای توانمند |
آنتونیو تورکر |
- |
|
201 |
" |
18 |
گیلان و پرورش کرم ابریشم، در سده نوزدهم میلادی |
دکتر علی فروحی |
- |
|
202 |
" |
21 |
فرهنگ جامع فرش ایران |
فاطمه عرب |
قسمت سوم |
|
203 |
" |
22 |
فرش دستباف و موقعیت بینالمللی دموتکس |
گروه پژوهش |
قسمت آخر |
|
204 |
" |
28 |
تجارت خارجی از نگاه آمار و ارقام |
- |
نقل از مجله اتاق تجارت ایران و آلمان |
|
205 |
" |
30 |
گزارشی از مجمع عمومی سالانه اتحادیه واردکنندگان فرشهای شرقی (BVOI) |
- |
گزارش |
|
206 |
" |
33 |
بررسی فرش اراک |
اقدس شفیعی |
معرفی پایاننامه |
|
207 |
" |
33 |
بررسی طرحها و نقوش گلیمهای روستایی و عشایر استانهای سمنان و خراسان |
سهیلا محمدپور رضایی |
معرفی پایاننامه |
|
208 |
" |
34 |
آییننامه اجرایی و وظایف میز فرش |
- |
- |
|
ردیف |
شماره مجله |
شماره صفحه |
عنوان مطلب |
نویسنده |
توضیحات |
|
96 |
6 9/1377 |
2 |
فرش و اشتغال |
محمود قلعهنویی
|
سرمقاله |
|
97 |
" |
4 |
دموتکس در انتظار ابتکارات تازه |
- |
- |
|
98 |
" |
6 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (6) |
- |
فرش پاکستان |
|
99 |
" |
8 |
معرفی فرشهای اصیل (2) |
- |
قالی هریس |
|
100 |
" |
10 |
عرفان در قالی ایران |
محمد حیدری |
قسمت اول |
|
101 |
" |
12 |
گلیم از ازل تا کنون |
نصرالله تسلیمی |
|
|
102 |
" |
14 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت ششم |
|
103 |
" |
16 |
قالی مقدس (نگاهی به مراسم ملی و مذهبی قالی شویان در اردهال کاشان) |
سیفالله امینیان |
قسمت دوم |
|
104 |
" |
18 |
فرشهای هنری را به موزهها بسپارید |
واتانابه (مردمشناس ژاپنی) |
مصاحبه |
|
105 |
" |
20 |
خدا قوت بافنده بختیاری |
سلیمه کاظمینی |
نامه ای برای یک دوست |
|
106 |
" |
21 |
نگارخانه سبز، بستر گلیمهای زیبا |
- |
گزارش |
|
107 |
" |
24 |
رفوگری هنری ناشناخته |
محمود حاجی نصیری |
قسمت دوم |
|
108 |
" |
26 |
تواناییهای دموتکس 99 |
د. دکمن |
- |
|
109 |
7 و 8 10و11/77 |
2 |
کمیها و کاستیهای فرش ایران |
محمدرضا شادابرو |
سرمقاله |
|
110 |
" |
4 |
تو سبزتنی، با خزان نمیمیری |
تحریریه قالی ایران |
تسلیت تسلیت برای محمد عبادی |
|
111 |
" |
6 |
تاریخچه فرش ایران (دوره قبل از اسلام) |
محمود نایبزاده |
قسمت اول |
|
112 |
" |
8 |
مناسبترین دار قالی |
ژاله مجیب |
- |
|
113 |
" |
12 |
برای فرش ایران فردا خیلی دیر است |
دکتر کیخسرو سبحه |
- |
|
114 |
" |
16 |
ساز و برگهای طراحی |
- |
بخش اول |
|
115 |
" |
18 |
عرفان در قالی ایران |
محمد حیدری |
قسمت دوم |
|
116 |
" |
22 |
دستبافتههای گروس (گلیم) |
نصرالله تسلیمی |
قسمت اول |
|
117 |
" |
24 |
فرش در کریسمس |
نصرتالله محمودزاده |
- |
|
118 |
" |
26 |
دستبافتههای بلوچ |
- |
- |
|
119 |
" |
28 |
نامههای رسیده |
- |
- |
|
120 |
" |
29 |
اخبار |
- |
خبر |
|
121 |
" |
30 |
صنعت فرش و زیرادازها، سال 1999 را درمینوردد |
- |
- |
|
122 |
" |
34 |
دموتکس در کورس رقابت |
ریچارد بیتومسکی |
- |
|
123 |
9 و 10 12/77 و 1/78 |
2 |
سرمقاله |
تحریریه قالی ایران |
- |
|
124 |
" |
4 |
طبقهبندی فرشهای کردی ایران |
ویلیام ایگلتون |
- |
|
125 |
" |
6 |
نگرشی نو به طبقهبندی دارهای قالیبافی |
- |
- |
|
126 |
" |
9 |
فرش-نگرش علمی، نگرش سنتی |
شیرین صوراسرافیل |
- |
|
127 |
" |
12 |
قالیچه-طرحها و نقشها در قالیچههای محرابی |
زیگفرید گاسونگ |
ترجمه: رضا کرم افروز |
|
128 |
" |
16 |
تاریخچه فرش ایران (دوره بعد از اسلام) |
محمود نایبزاده |
قسمت دوم |
|
129 |
" |
20 |
اصالت و خلاقیت (اعجاز دستبافهای عربزاده) |
- |
- |
|
130 |
" |
22 |
فرشنامه ایران |
دکتر حسن آذرپاد فضلالله حشمتی رضوی |
معرفی کتاب |
|
131 |
" |
22 |
نقشهای قالی ترکمن و اقوام همسایه |
علی حصوری |
معرفی کتاب |
|
132 |
" |
22 |
غروب زرین فرش ساروق |
شیرین صوراسرافیل |
معرفی کتاب |
|
133 |
" |
23 |
سیری در هنر قالیبافی ایران |
محمد جواد نصیری |
معرفی کتاب |
|
134 |
" |
23 |
فرهنگ اصطلاحات فرش |
- |
- |
|
135 |
" |
24 |
بزرگان فرش ایران در عرصه طراحی و تولید |
- |
قسمت اول |
|
136 |
" |
27 |
دستبافتههای گروس (فرش) |
نصرالله تسلیمی |
قسمت دوم |
|
137 |
" |
30 |
نمایشگاه بزرگ فرش؛ طرحی نو؛ روشی نو |
- |
گزارش |
|
138 |
11 و 12 2و3/78 |
2 |
تکرار نقشهها یا تنوع طرحها |
تحریریه قالی ایران |
سرمقاله |
|
139 |
" |
3 |
گذری بر مضمونهای سنتی در فرش ایران |
دکتر علی حصوری |
- |
|
140 |
" |
6 |
جزیره مروارید کیش «خانه امن» فرش ایران |
نصرتالله محمودزاده |
فرش در کیش |
|
141 |
" |
8 |
نقوش گل و بوته با الهام از طبیعت... (1) |
هانین هگن بارت |
ترجمه: رضا کرم افروز |
|
142 |
" |
11 |
سفری مصور به منزلگاه کهن هنری بیرقیب (دورنمایی از فرشبافی در کرمان) |
Oriental Rug Magazine (March 1957) |
ترجمه مقاله |
|
143 |
" |
14 |
تاریخ بندر هامبورگ |
- |
- |
|
144 |
" |
16 |
شناخت کیفی فرش |
- |
- |
|
145 |
" |
20 |
نگاهی به قالیهای نفیس ایرانی در موزه هنرهای زیبای مردمان شرق؛ مسکو |
دکتر لقمان بایمتاف |
ترجمه: کیوان لؤلویی، حمید علامه |
|
146 |
" |
22 |
عرفان در فرش |
محمد حیدری دلگرم |
قسمت سوم |
|
147 |
" |
24 |
دستبافهای افشاری در فراز و نشیب تاریخ |
- |
قسمت اول |
|
148 |
" |
28 |
نان ونمک |
پرویز تناولی |
معرفی کتاب |
|
149 |
" |
28 |
شاهکارهای فرشبافی فارس |
سیروس پرهام |
معرفی کتاب |
|
150 |
" |
28 |
سیری در هنر قالیبافی ایران |
محمد جواد نصیری |
معرفی کتاب |
|
151 |
" |
28 |
دستبافتهای عشایری و روستایی فارس |
سیروس پرهام |
معرفی کتاب |
|
152 |
" |
30 |
فرش ایرانی هنوز هم حرف اول را در دنیا میزند. |
اکبر هریسچیان |
مصاحبه |
رنگ متن:
همخوانی رنگ فرش دستباف با دکوراسیون منازل، مهمترین مسئله قابل تأمل در بازار فرش بلژیک است:
همنشینی و تضاد رنگی:
در این بازار، خریداران فرش دستباف، بیشتر تمایل دارند که متن و حاشیه فرش دارای همنشینی رنگی باشند:
عوامل مورد نظر مشتریان بلژیکی:
خریداران فرش دستباف در بلژیک، مهمترین و بهترین خصیصه فرش دستباف ایرانی را اصالت و سپس رنگبندی آن میدانند:
مزیت فرش دستباف کشورهای رقیب ایران در بازار بلژیک:
در حال حاضر مهمترین مزیت فرش کشورهای رقیب، طرح فرش میباشد. در سالهای اخیر، کشورهای رقیب ایران در زمینه تولید فرش دستباف، با روی آوردن به استفاده از طرحهای ایرانی و طرحهای مورد پسند مشتریان بلژیکی، به این مهم دست یافتهاند. پس از طرح، قیمت و سپس رنگ و ابعاد قرار دارند:
نتیجه:
اصالت و رنگبندی فرش ایرانی مهمترین خصیصههای مورد نظر خریداران بلژیکی است؛ و از آنجا که مهمترین خصوصیت فرش کشورهای رقیب، طرح آنها میباشد (و البته طرح این فرشها کپیبرداری از فرشهای ایرانیست)، پس با عرضه طرحهای مورد نظر این بازار که اکثراً خواهان طرحهای افشان و غیر لچک ترنج هستند، میتوان بازار این کشور را مجدداً در دست گرفت.
تصویرسازی یک فرش با بیشترین تقاضا در بازار اتریش بر اساس سایر یافتههای این بازار:
فرش 9 متری (3.5x2.5) با رنگ زمینه لاکی روناسی و حاشیهای با تونالیته مشابه، دارای رجشمار 25 تا 35 با خامه از جنس پشم و طرح افشان شاه عباسی بهصورت خلوت با قیمت حدود 9 تا 45 میلیون ریال (تقریباً معادل 680 تا 3400 یورو)
رنگ متن:
طبق سلیقه خریداران فرش دستباف اتریش، رنگهای کرم و لاکی بیشترین تقاضا را دارد. درصد تقاضای فرش دستباف
بر اساس رنگ متن به قرار زیر میباشد:
همنشینی و تضاد رنگی:
در رنگبندی فرش، یکی از نکات مهم، چگونگی قرار گرفتن رنگها به لحاظ همنشین بودن (مانند رنگ سرمهای حاشیه و رنگ آبی تیره در متن) و یا متضاد بودن (مانند رنگ کرم حاشیه و رنگ لاکی متن) است؛ در بازار اتریش علاقه بیشتر خریداران به همنشین بودن رنگهاست.
عوامل مورد نظر مشتریان اتریشی:
خریداران فرش دستباف ایران در اتریش مهمترین عامل خرید فرش را کیفیت آن میدانند و رنگبندی در رتبه دوم قرار میگیرد.
مزیت فرش دستباف کشورهای رقیب ایران در بازار اتریش:
مهمترین مزیت فرش کشورهای رقیب ایران در این بازار، رنگ و سپس قیمت آنها میباشد. درصد این مزایا و سایر عوامل نیز بدین شرح میباشد:
نتیجه:
طبق نظر مشتریان بازار اتریش، کیفیت فرش ایرانی مهمترین عامل در خرید این فرش میباشد، همچنین مهمترین مزایای فرش کشورهای رقیب ایران، رنگ و قیمت آن است؛ در نتیجه با اصلاح رنگبندی و استفاده از رنگهای روشن که دارای همنشینی در حاشیه و متن باشند، میتوان بازار این کشور را برای فرش ایرانی در دست گرفت.
تصویرسازی یک فرش با بیشترین تقاضا در بازار اتریش بر اساس سایر یافتههای این بازار:
فرش 6 متری (3x2) با رنگ زمینه کرم و حاشیهای با تونالیته مشابه، دارای رجشمار 25 تا 35 با خامه پشمی و طرحی نظیر طرحهای ذهنی مشابه گبه و بهصورت خلوت با قیمت حدود ۶ تا ۳۰ میلیون ریال (تقریباً معادل ۴۵۰ تا ۲۲۵۰ یورو)
رنگ نارنجی یك رنگ گرم میباشد، زیرا تركیبی از رنگ زرد و قرمز است و به نظر می رسد كه این رنگ یك رنگ شاد و زندگی بخش است.
رنگ نارنجی، رنگ روز سپاسگزاری و نشانی از چشم انداز پاییزی و شعله آتش میباشد. نارنجی رنگ خوشبختی بوده و احساسات ما را آزاد و باعث ترویج احترام به خود می شود و به خاطر اثر تحریك كنندگی آن با افسردگی مقابله و شوخ طبعی را در انسان پرورش میدهد و رنگهای روشنتر آن مانند هلویی و زرد آلویی باعث رفع عصبانیت میشود.
این رنگ چون تركیبی از زرد و قرمز است به عنوان یك رنگ انرژی زا در نظر گرفته میشود. رنگ نارنجی به طرق گوناگونی شاد به نظر میرسد و مثل زرد تحریك كننده و مانند قرمز مملو از شور و علاقه و نشاط است؛ هرچند كه با یك درجه كمتر، میباشد. رنگ نارنجی به گرما، خورشید، انرژی و پاییز اشاره دارد. این رنگ را میتوان در تغییر رنگ برگهای پاییزی، غروب خورشید و پوستوگوشت مركبات دید. این رنگ تغییر فصلها را نشان میدهد كه با این مفهوم به صورت یك مرز (حد فاصل) میباشد، یعنی رنگ تغییر بین گرمای تابستان و سرمای زمستان. این رنگ همچنین به این خاطر كه رنگ مركبات است، میتواند تصوری از ویتامین C و سلامتی خوب باشد.
اگر شما میخواهید توجهی را بدون داد و فریاد به دست آورید از رنگ نارنجی استفاده كنید، چون این رنگ توجه را مطالبه میكند. این رنگ به افراد فعال و متكی به نفس اشاره دارد و حتی به نظر میرسد كه رقاصها اغلب مجذوب رنگ نارنجی میشوند. از رنگ نارنجی برای جلب توجه در علامتها یا تابلوهای ترافیكی در جادهها و بزرگراهها و آگهیها استفاده میشود.
رنگ نارنجی یكی از رنگهای التیام دهنده است و گفته میشود كه میل به غذا را افزایش داده و نیز باعث تحریك اشتیاق و خلاقیت می شود؛ نارنجی یعنی شور و نشاط با بردباری .افرادی كه لباس نارنجی را دوست دارند، معمولاً متفكر و صمیمی هستند؛ این افراد اغلب فعال و لایقند. آنها مستقل و انگیزه دهنده، رقابت جو و با قدرتِ سازماندهی خوب میباشند. این افراد همچنین اشخاصی خلاق، عملگرا، مملو از انرژی و عدم سكون و ثابت ماندن در جایی هستند. این رنگ برای اتاق ناهار خوری، اتاق نشیمن و سالنهای ورودی مناسب است. ولی وقتی كه در اتاق خواب استفاده شود، ممكن است شخص را در حالت بیدار نگه دارد. وقتی كه از رنگ نارنجی در اتاقی استفاده میشود، باعث میشود كه اتاق كوچكتر به نظر رسد. بنابراین در صورت استفاده از آن مطمئن شوید كه به اتاق نور فراوان برسد.
در زندگی تان برای بهدست آوردن احساس گذشت سریعتر زمان (وقتی احساس میکنید زمان کند میگذرد)، افزایش خلاقیت، رهایی از چیزهایی كه خیلی جدی و خشك به نظر می رسند، از رنگ نارنجی استفاده كنید.
|
ردیف |
نام فارسی |
نام لاتین |
نام علمی |
رنگ اصلی |
|
1 |
سرخس عقابی، کرف |
Bracken |
Pteridium Aquilinum |
زرد طلایی، سبز زیتونی و قهوهای |
|
2 |
سرو کوهی (ارس) |
Juniper |
Juniperus Communis |
زرد خردلی |
|
3 |
سماق |
Staghorn Sumac |
Rhus Typhina |
قهوهای کمرنگ، زنگی و نارنجی |
|
4 |
سمان کوهی، ون کوهی، زبان گنجشک کوهی |
Rowan, Mountain Ash |
Sorbus Species |
رنگ طلایی مایل به سبز |
|
5 |
سنجد تلخ، سیاه تنگرس، ارجنک، خار گوزن |
Buckthorn |
Rhamnus Species |
زرد، سبز |
|
6 |
سوسن چشم مشکی، گل مخروطی، کوکب کوهی |
Rudbeckia, Coneflower |
Rudbeckia Species |
سبز، زیتونی و طلایی |
|
7 |
سیب |
Apple |
Malus Species |
سبز زیتونی و قهوهای |
از عموم استادان، پژوهشگران و صاحبنظران برای نگارش مقاله، دعوت به همکاری میشود.
مهلت ارسال مقالات: 15/2/1388
برای دستیابی به برگهی اعلام همکاری، موضوعات و مداخل به پایگاههای زیر مراجعه فرمایید:
محورهای دایرةالمعارف:
نشانی دبیرخانه:
تهران، خیابان ولیعصر، سهراه زعفرانیه، ساختمان افشار، شمارهی 1753، طبقهسوم، بنیاد دانشنامهی بزرگ فارسی
کد پستی: 33171-19617
تلفن: 19 و 22717117 ، 22705848
نمابر: 22741471
پست الکترونیکی: bdbf@bdbf.org.ir
حامیان:
· مرکز ملی فرش ایران
· مؤسسهی مطالعات و پژوهشهای بازرگانی
· کانون هماهنگی فنآوری فرش ایران
دوازدهم اسفند ماه 1387 دومین جشنواره فرش دستباف در استان یزد برگزار گردید.
در این جشنواره علاوه بر تقدیر از پیشکسوتان و دست اندرکاران تمامی مشاغل مربوط با هنر-صنعت فرش دستباف، به آقای «مهندس محسن برزگری» به عنوان پژوهشگر نمونه و همچنین آقای «سید جواد حسینی» به عنوان دانشجوی برتر نیز لوح تقدیر و نیم سکه بهار آزادی تعلق گرفت.
به ایشان تبریک گفته و آرزوی موفقیت و سربلندی برایشان داریم.
|
ردیف |
شماره مجله |
شماره صفحه |
عنوان مطلب |
نویسنده |
توضیحات |
|
60 |
4 7/1377 |
2 |
آینده ی هنر فرش |
محمود قلعه نویی |
سرمقاله |
|
61 |
" |
3 |
اخبار |
- |
خبر |
|
62 |
" |
4 |
نگاهی به دستباف های یک هنرمند ناشنوای گیلانی |
- |
فرش صلح و سازندگی |
|
63 |
" |
6 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (4) |
- |
جایگاه فرش ایران در اروپا |
|
64 |
" |
8 |
قالیچه های عشایری |
جنی هاوسگو |
معرفی کتاب |
|
65 |
" |
8 |
برگی از قالی خراسان |
تورج ژوله |
معرفی کتاب |
|
66 |
" |
8 |
قالی ایران یا باغ همیشه بهار |
پاتریس فونتن |
معرفی کتاب |
|
67 |
" |
8 |
مجنونی ها |
هادی سیف |
معرفی کتاب |
|
68 |
" |
10 |
کاوشی در نقشمایه های فرش و قالیچه های سنگان خواف |
تورج ژوله |
- |
|
69 |
" |
12 |
نقش طرازی جلوه های زیبایی |
آیت الله خامنه ای |
سخنرانی |
|
70 |
" |
13 |
«اورتفا» یک امتیاز بزرگ برای فرش ایران |
- | - |
|
71 |
" |
16 |
رنگ و رنگرزی |
مجتبی تهرانچی |
- |
|
72 |
" |
17 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت چهارم |
|
73 |
" |
18 |
دلایل رکود بازار فرش ایران در اروپا (2) |
گروه پژوهش مجله |
میز گرد پنهان 2 |
|
74 |
" |
19 |
رفوگری، هنری ناشناخته |
محمود حاجی نصیری |
قسمت اول |
|
75 |
" |
20 |
فرش های موزه ای (1) |
واحد تحقیقات مجله |
فرش گلستان |
|
76 |
5 8/1377 |
2 |
رقابت یا رفاقت |
محمود قلعه نویی |
سرمقاله |
|
77 |
" |
3 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت پنجم |
|
78 |
" |
4 |
نگاهی به تلاش هامبورگی ها برای رونق بازار فرش |
- |
بازار فرش آلمان |
|
79 |
" |
7 |
فرش های موزه ای (2) |
واحد تحقیقات مجله |
طرح: ترنج گلدار حیوانی |
|
80 |
" |
8 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (5) |
- |
فرش هندوستان |
|
81 |
" |
10 |
اخبار |
- |
خبر |
|
82 |
" |
12 |
نمایشگاه تورنتو، گام های پیش رو |
- | - |
|
83 |
" |
14 |
نمایشگاه تورنتو در یک نگاه |
گروه پژوهش و تحقیق |
- |
|
84 |
" |
15 |
من گبه هستم |
گبه |
- |
|
85 |
" |
16 |
فرهنگ اصطلاحات فرش ایران |
دکتر علی حصوری |
قسمت اول |
|
86 |
" |
18 |
معرفی فرش های اصیل (1) |
ساروق | |
|
87 |
" |
20 |
جوانان، مشتریان فردای قالی ایران در ژاپن |
گروه پژوهش و تحقیق |
مصاحبه با پروفسور توهوسوگیمارا |
|
88 |
" |
24 |
نگاهی به دستباف های یک هنرمند ناشنوای گیلانی |
- |
فرش جنگ و صلح |
|
89 |
" |
25 |
نیاز جان و فرش ترکمن |
ذبیح الله بداغی |
معرفی کتاب |
|
90 |
" |
25 |
قالی و قالیچه های ایران (جلد اول) |
جواد یساولی |
معرفی کتاب |
|
91 |
" |
25 |
دستبافت های عشایری و روستایی فارس (جلد دوم) |
سیروس پرهام - سیاوش آزادی |
معرفی کتاب |
|
92 |
" |
26 |
قالی ایران؛ در حسرت رنگ های طبیعی |
نصرالله تسلیمی |
- |
|
93 |
" |
28 |
این جزیره همچنان آرامش بخش خواهد ماند؟ |
ریچارد بتومسکی |
مصاحبه |
|
94 |
" |
30 |
قالی مقدس (نگاهی به مراسم ملی و مذهبی قالی شویان در اردهال کاشان) |
سیف الله امینیان |
قسمت اول |
|
95 |
" |
32 |
متولی فرش چه کسی باید باشد |
گروه پژوهش و تحقیق |
میز گرد پنهان 2 |
|
ردیف |
شماره مجله |
شماره صفحه |
عنوان مطلب |
نویسنده |
توضیحات |
|
۱ |
1 4/1377 |
7 |
کدام قانون مناسب حال فرش است |
- |
- |
|
2 |
" |
10 |
هفت شهر عشق فرش |
هیأت تحریریه مجله |
- |
|
3 |
" |
12 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت اول |
|
4 |
" |
13 |
دلایل رکود بازار فرش ایران در اروپا (1) |
گروه پژوهش مجله |
میز گرد پنهان 1 |
|
5 |
" |
19 |
رسام که بود و چه کرد؟ |
- |
- |
|
6 |
" |
23 |
نامگذاری یک روز به نام «روز فرش» |
دکتر مهاجرانی |
سخنرانی |
|
7 |
" |
24 |
فرش بنی آدم |
- |
به نقل از استاد عرب زاده |
|
8 |
" |
26 |
در کمیته ی بند «م» چه گذشت؟ |
- |
گزارش |
|
9 |
" |
29 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (1) |
- |
آمار مرکز تجارت بین الملل |
|
10 |
" |
32 |
نامه ی سرگشاده ی گبه خانم |
گبه خانم |
- |
|
11 |
" |
34 |
اخبار |
- |
خبر |
|
12 |
" |
35 |
سفره های کامو |
پرویز تناولی |
معرفی کتاب |
|
13 |
" |
37 |
قالی ایران |
سیسیل ادواردز |
معرفی کتاب |
|
14 |
" |
37 |
فرش های ترکمن |
بوگولیوف |
معرفی کتاب |
|
15 |
" |
37 |
با تار و پود عشق |
محمد صادق فسایی |
معرفی کتاب |
|
16 |
" |
37 |
فرهنگ جامع فرش |
احمد دانشگر |
معرفی کتاب |
|
17 |
" |
37 |
فرش بر مینیاتور |
علی حصوری |
معرفی کتاب |
|
18 |
" |
38 |
مجتمع آموزشی و هنری شرکت سهامی فرش ایران - کاشان |
- |
معرفی مجتمع |
|
19 |
" |
41 |
فرش در جام جهانی فوتبال 1998 |
- |
فرش |
|
20 |
" |
43 |
نقبی به اعماق هنر ایران |
- |
اولین مسابقه طرحها و نقشه های فرش دستباف ایران |
|
21 |
" |
45 |
فرش و آموزش دانشگاهی آن |
دکتر حسین یاوری |
- |
|
22 |
" |
50 |
تاریخ فرش در یک نگاه |
- |
- |
|
23 |
" |
52 |
هنر یا دلار؟ |
نصرت الله محمود زاده |
- |
|
24 |
2 5/1377 |
4 |
در انتظار کمیته ی بند «ک» |
محمود قلعه نویی |
سرمقاله |
|
25 |
" |
5 |
چرا باید فرش را جدی بگیریم |
- |
- |
|
26 |
" |
7 |
فرش و نرخ گذاری |
- |
- |
|
27 |
" |
8 |
رجشمار و زمان |
واحد تحقیقات مجله |
زمان بافت بر اساس رجشمار |
|
28 |
" |
10 |
نمایشگاه بزرگ فرش به کجا می رود |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
29 |
" |
11 |
«اولین نمایشگاه فرش چگونه آغاز شد» |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
30 |
" |
12 |
هجوم برای شرکت در دومین نمایشگاه |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
31 |
" |
13 |
استقبال از سومین نمایشگاه فرش |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
32 |
" |
14 |
چهارمین نمایشگاه، اوج توقعات و انتظارات |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
33 |
" |
16 |
نمایشگاه پنجم، تکرار نمایشگاه قبلی |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
34 |
" |
17 |
نمایشگاه ششم، بستر جمع بندی |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
35 |
" |
18 |
پیش بینی هفتمین نمایشگاه |
گروه گزارش و خبر |
گزارش |
|
36 |
" |
21 |
اخبار |
- |
خبر |
|
37 |
" |
22 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت دوم |
|
38 |
" |
23 |
خصوصیات الیاف و رنگ ها |
مصطفی هاشمی طبا |
برداشت از مصاحبه |
|
39 |
" |
24 |
چین و تولید فرش های چینی – ایرانی |
نیل موران |
- |
|
40 |
" |
26 |
بنیاد نمایشگاه های فرش تورنتو، سومین نمایشگاه فرش را در کانادا برگزار می نماید. |
- |
- |
|
41 |
" |
27 |
فرش ایران و معیارهای تولید در بازارهای جهانی |
- |
- |
|
42 |
" |
30 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (2) |
- |
آمارهای مرکز گمرک ایران و سازمان ملل متحد |
|
43 |
" |
33 |
نوآوری در نقوش فرش ترکمن |
- |
- |
|
44 |
" |
35 |
فرش ترکمن |
- |
فرش |
|
45 |
3 6/1377 |
2 |
فرش و دکوراسیون |
محمود قلعه نویی |
سرمقاله |
|
46 |
" |
3 |
من یک بافنده ی ایرانی هستم |
یک بافنده ی بختیاری |
- |
|
47 |
" |
4 |
درس هایی از اساتید فرش ایران |
فضل الله حشمتی رضوی |
کلاس قالیبافی استاد رسام عرب زاده - رفوگری |
|
48 |
" |
6 |
اخبار |
- |
خبر |
|
49 |
" |
8 |
در هفتمین نمایشگاه بزرگ فرش چه گذشت |
- |
- |
|
50 |
" |
10 |
فرش ایرانی از نگاه یک محقق آمریکایی |
دکتر مورای ایلندسوم |
- |
|
51 |
" |
12 |
رنگ گیاهی در بافته های چهارمحال بختیاری و فارس |
سید عباس سیاحی |
- |
|
52 |
" |
14 |
فرش از نگاه آمار و ارقام (3) |
- |
جایگاه فرش ایران در آلمان |
|
53 |
" |
16 |
قالیچه های تصویری ایران |
پرویز تناولی |
معرفی کتاب |
|
54 |
" |
16 |
دستبافت های عشایری و روستایی فارس (جلد اول) |
سیروس پرهام |
معرفی کتاب |
|
55 |
" |
16 |
فرش سیستان |
علی حصوری |
معرفی کتاب |
|
56 |
" |
16 |
فرش ایران (جلد اول) |
سیاوش آزادی |
معرفی کتاب |
|
57 |
" |
17 |
کنکاش پیرامون فرش لری |
دکتر علی حصوری |
قسمت سوم |
|
58 |
" |
23 |
قشقایی |
- |
فرش |
|
59 |
" |
25 |
یلمه |
- |
فرش |
فنیقی ها اولین بار در 1000 سال پیش از میلاد مسیح این رنگ را کشف کردند، که منشأ آن شهر «تایر Tyr»، پایتخت فنیقی هاست. از این رنگ با عنوان «ارغوانی تایری Tyrian purple»
هم یاد شده است و از دو نوع حلزون دریایی به نامهای «مورکس Murex» و «پورپوریا Purpurea» به دست می آید. غده ای مجاور حفرهﻯ تنفسی آنها وجود دارد که این رنگ را ترشح می کند. برای به دست آوردن 1 گرم از این رنگ باید حدود 5000 حلزون استفاده شود که همین امر و همچنین سختی فرآوری آن باعث بالا بودن قیمت آن بوده است.
افسانه ای یونانی «هرکول»، قهرمان اسطوره ای یونان را کاشف این رنگ می داند؛ او هنگامی که سگش یک حلزون را خورد و دهانش ارغوانی شد، این موضوع را فهمید. به تازگی در جزیرهﻯ «کرت Crete» تعداد بسیار زیادی صدف حلزون از گونهﻯ «مورکس Murex» یافت شده است که بر اساس این شواهد تصور می شود، «مینوها Minoans»ی ساکن در «کرت Crete» کاشف این رنگ باشند نه فنیقی های «تایر Tyr».
تکه هایی از لباسی ارغوانی از یک آرامگاه یونانی به دست آمده است. یونانی ها از این رنگ به عنوان یک رنگ سلتنطی استفاده می کردند؛ در ایران هم برای لباس پادشاهان از ارغوانی استفاده می شد. تا قرن هفدهم میلادی در ایرلند هم این رنگ به عنوان رنگی پادشاهی شناخته می شد. در یونان از ریشهﻯ گیاهی به نام «الکانت»، برای رقیق کردن و گاهی کلاً به جای این رنگ استفاده می شد.
«پلینی Pliny»، طبیعی دان رومی در قرن اول میلادی، در مورد استفادهﻯ این رنگ توسط مصریان در 1500سال پیش از میلاد مسیح توضیحاتی را آورده است. در همین زمینه، پاپیروس هایی از مصر به دست آمده که رنج های یک رنگرز - که با این رنگ کار می کرده است - را به زبان شعر و با خط هیروگلیف بیان کرده است.
«پلوتارک Plutarch »، مورخ یونانی، از 5000 تالانت ( هر تالانت برابر 260 کیلوگرم است ) پارچه ارغوانی که توسط سپاهیان «اسکندر Alexander» در سال 331 پیش از میلاد از «شوش Susa» به غارت رفته نامبرده است. این پارچه ها که 190 سال عمر داشتند، هنوز رنگ خود را به خوبی حفظ کرده بودند. ارزش این پارچه ها با مقیاس امروزی، بالغ بر 6 میلیون دلار بوده است. در قرن چهارم میلادی، در زمان امپراتوری «آگوستوس Agustus» بر روم، لباسی به وزن 1 پوند که با رنگ حلزون ارغوانی رنگ شده باشد، ارزشی معادل 20,000 دلار کنونی داشته است.
لعابها طیف وسیعی از ترکیبات آلی و معدنی را در بر میگیرند. لعاب مربوط به سرامیک معمولا مخلوط شیشه مانندی متشکل از کوارتز ، فلدسپار و اکسید سرب (PbO) است.
این اجزا را پس از آسیاب شدن و نرم کردن به صورت خمیری رقیق درمیآورند. آنگاه وسیله سرامیکی مورد نظر را در این خمیر غوطهور کرده و پس از سرد و خشک شدن ، آن را در کوره تا دمای معین حرارت میدهند. پس از لعاب دادن روی چینی ، روی آن مطالب مورد نظر را مینویسند و یا طرح مورد نظر را نقاشی میکنند و دوباره روی آن را لعاب داده و یک بار دیگر حرارت میدهند. در این صورت وسیله مورد نظر پرارزشتر و نوشته و طرح روی آن بادوامتر میشود. لعابها در انواع زیر وجود دارند:
لعاب بیرنگ: این نوع لعاب که برای پوشش سطح چینیهای بدلی ظریف بکار میرود، بی رنگ و شفاف است و از مخلوط کلسیم و سیلیس و خاک چینی سفید تهیه میشود.
لعاب رنگی: برای رنگ آبی از اکسید مس (Cu2O) ، برای رنگ زرد از اکسید آهن (FeO) و برای رنگ سبز از اکسید کروم (Cr2O3) ، برای رنگ زرد از کرومات سرب و برای رنگ ارغوانی از ارغوانی کاسیوس استفاده میشود.
لعاب کدر: این نوع لعاب که برای پوشش چپنیهای بدلی معمولی بکار میرود و از مخاـوط SnO2 , PbO , SiO2 , Pb3O4 ، نمک و کربنات سدیم تهیه میشود که آن را پس از ذوب کردن ، سرد کردن و پودر کردن ، در آب به صورت حمام شیر در میآورند و شیئ لعاب دادنی را در آن غوطهور میکنند.
اکثر رنگرزخانه های سنتی شهر کاشان از یک یا چند چهار طاقی متصل به هم تشکیل شده است.وسعت کارگاه ها و همچنین نوع آرایش داخلی آن اعم از دیوار چینی معمولی
(به صورت سفت کاری) با کاهگل و یا سفید کاری و یا سقفهای تزیین یافته به کاربندی و غیره، رابطه ی مستقیم با بضاعت و توانایی مالی صاحب رنگرزخانه دارد. به این معنی که یک رنگرز ساده با بضاعت مالی اندک به یک کارگاه با سفت کاری معمولی اکتفا کرده و دیگری که متمول تر بود تا حد توانایی به آرایش داخل کارگاه خود پرداخته است.قدمت بنای کارگاه های رنگرزی همزمان با قدمت بازار کاشان یعنی از حدود حکومت زندیه است که البته تغییر و تبدیل هایی در دوران های مختلف در آن رخ داده است. وجود چاه نیمه عمیق قدیمی و حوضچه های شست وشوی مواد رنگ شده و همچنین حیاط مانندی فضای بدون سقف در کنار کارگاه ها از دیگر ویژگی های محل فعالیت رنگرزان است. فرورفتگی های میان هر دو ستون در اکثر کارگاه های رنگرزی که امروز جای اجاق و پاتیل مسی رنگرزی خامه است ، در گذشته جای قرار گرفتن خمره های رنگرزی با نیل طبیعی (غیر آماده) بود. علت جایگزین شدن اجاق و پاتیل رنگرزی به جای خمره های سفال قدیمی تحولی است که حدود نود سال قبل در ابزار حرفه ی رنگرزی به وجود آمد.(کارگاه های رنگرزی خامه ی قالی در گذشته ، کارگاه های رنگرزی اجناس شعر بافی بودند که تغییر کاربری دادند). از دیگر قسمت های کارگاه ، پلکان قدیمی متصل به پشت بام است که در انتقال خامه ی رنگ آمیزی شده به پشت بام و خشک کردن آن (در فصل سرما و اعتدال) نقش به سزایی دارد. در فصل تابستان و گرما خامه های رنگ شده را در حیاط مجاور کارگاه خشک می کنند.
رنگرزخانه های شهر کاشان در محدوده ی بافت قدیمی آن و اکثرا در کنار بازار اصلی شهر قرار دارند. علت تمرکز رنگرزی ها در محدوده بازار و مرکز داد و ستد شهر به آن علت است که رنگرزان نباید از مرکز اصلی مراجعین بازار که عموما دست اندر کار امر تولید قالی هستند؛ دور باشند. مراکز تجمع کارگاه های رنگرزی به ترتیب اهمیت عبارت اند از : «بازارچه صباغ ها»، «بازارچه درب زنجیر»، «بازار مسگرها»، «بازار یانخل»، «بازارچه ضرابخانه»، «محله قبرستان درب باغ»، «بازار گذرنو»، «بازارچه میانچال»، «محله درب یلان»، «کوی سر پله»، «کوچه دمقاچی ها»، «گذر بابا ولی»، «محله طاهر و منصور» و «کوی پاقپان».
از ديرباز انسان از مواد مختلف موجود در طبيعت برای رنگرزی استفاده مي كرد.ابتدايي ترين رنگ برای بشر اوليه سياه و قرمز بوده است كه به دنبال اين شناخت ،انسان از خاك زرد به عنوان رنگ زرد و از خاك سرخ به عنوان رنگ سرخ و از زغال به عنوان رنگ سياه استفاده مي كرده است . پيشينه ی رنگ سازی در ايران قدمتی چند هزارساله دارد كه نقاشيهای ابنيه ی تاريخی و منسوجات به دست آمده از قديم گواه اين مدعاست . گذشته از آثار به جا مانده از دوران هخامنشی و ساسانی كه نشان دهنده ی مهارت ايرانيان در بافت و رنگرزی فرش و منسوجات مختلف است ، عصر صفويه اوج شكوفايی اين هنر در ايران است . 
رنگرزی در اين دوران شاد و متنوع بوده است .در برخی از مينياتورهای اين دوره قاليهايی با زمينة سبز يا زرد ديده مي شود كه نشان دهنده ی سابقه برخی از رنگ بندي های دوره ی صفوي ، مخصوصاً با زمينه ی زرد است كه البته امروزه هيچ پسنديده نيست ، زيرا متاسفانه در تاريخ معاصر ايران استفاده ازرنگهای تيره بيشتر شده است . اما با توجه به سوابق تاريخی و اين كه ملت ما بسيارشاد و اهل زندگی بوده است و با توجه به نقاشيها و نمونه های بازمانده از دوره ی صفوي ، در مي يابيم كه رنگ بندی قالی ايران مخصوصا از دوره ی صفوی به بعد تغييركرده و روز به روز تيره تر شده است . اقليم و پوشش گياهی ايران هم در تدارك رنگهای روشن كمك مي كرده است نه رنگهای تيره ، زيرا از مجموع گياهان رنگي ،تنها نيل كه در خوزستان كاشته مي شد، رنگ سرمه ای مي داد. رنگ سياه و قهوه اي تيره از آنجا كه با استفاده از دندانه های پوساننده تهيه مي شد، در قالی ايران چندان كاربردی نداشته است و اگر داشته در قاليهای پست بوده است . گياهان رنگی ايران همه رنگهای شاد ميدهند، حتی پوست گردو و حنا.
آشنايی با رنگدانه های گياهی و حيوانی بسته به قسمت رنگدار: قسمتهای رنگدار در گياهان مختلف ، متفاوت است . در بعضی از گياهان موادرنگی در ريشه ی آنها موجود است مانند روناس . در بعضی ديگر مواد رنگی در گل وجود دارد مثل اسپرك ، زعفران ، گندل و... برخی نيز در برگ آنها مانند نيل و توت و.... در برخی ديگر نيز در پوست ميوه ی آنهامانند انار، پياز و... و يا در پوست ساقه ی آنها موجود است مانند بلوط ، و برخی گياهان ،تمامی قسمتهای آنها رنگدار است بعنوان مثال تمامی قسمتهای سماق بخصوص ميوة آن دارای مواد رنگين است . همچنين از تمامی قسمتهای گزنه غير ريشه ی آن برای رنگرزی استفاده مي كنند.
«هانس ای دولف» در كتاب صنایع دستی كهن ایران بیان کرده است: «روناس در 3000 سال پیش از میلاد در درهﻯ سند در شهر «موهن جودارو» شناخته شده است و از آنجا نخست به خاورمیانه گسترش یافت.»1
در «تورات» و همچنین نوشته هایی كه از قبور فراعنه مصر به دست آمده است، مداركی در مورد رنگرزی با روناس وجود دارد. همچنین آثاری از رنگ قرمز حاصل از ریشه روناس در یکی از مقبره های مصری متعلق به 1400 سال پیش از میلاد مسیح یافت شده است. علاوه بر «تورات» در «بندهش» هم از این گیاه نام برده شده است؛ «هر چه را جامه به آن شاید رشتن ( یعنی رنگ کردن، ریسیدن، تافتن، تابیدن )، مانند سرکه و دار پرنیان و زردچوبه و روناس و نیل، رنگ خوانند.»2
در پاپیروس های مصری قرن سوم پیش از میلاد مسیح، نام این گیاه عنوان گردیده و در مورد آزمایشهای کنترل رنگ آن توضیحات زیادی آمده است. در یکی از پاپیروس های مصری در همین مورد مطلبی با این مضمون آمده است: «دانه هایی همراه با خمره ها. بوی نافذی دارد. دست های او با روناس به رنگ سرخ درآمده است، گویی که با خون آغشته شده است. مانند پرنده ای شکاری که خونین شده است، مانند اینکه گوشتش از زیر پوست نمایان شده است.»3
«دیوس کوریدس Dioscorides» ،فیزیکدان یونانی، آن را تولید کنندهﻯ رنگ قرمز دانسته است.«پلینی Pliny» ،طبیعیدان رومی، در این رابطه در کتاب «تاریخ طبیبعی» نوشته است: «دو گیاه دیگر هم وجود دارد... اولی روناس است، کاربرد آن برای رنگرزی پشم و چرم ضروری است. روناس ایتالیا با ارزش ترین آنهاست، مخصوصاً آنها که در حومهﻯ شهر می رویند؛ همچنین تقریباً در تمام شهرهای دیگر هم، به مقدار زیاد تولید می گردد. به صورت خودرو رشد می کند، ولی قابلیت کشت شدن هم دارند... ساقهﻯ آن خاردار و مفصل دار است، با پنج برگ که اطراف مفصل قرار گرفته اند. دانهﻯ آن قرمز است.»4
رنگرزان ایرانی و رومی آن را می شناختند؛ قبور یافت شده مربوط به قرون دوم و سوم میلادی در روم که در آنها پارچه های رنگ شده با نیل و روناس وجود داشتند، گواه همین مدعاست؛ ولی در دوره های بعدی و در زمان فرمانروایی رومیان استفاده از آن در اروپا از بین رفت، تنها مدرک به دست آمده، پارچه ای رنگ شده با روناس است که از گور ملکه «آرنگوندیس Arnegundis» در «سنت دنیس St. Denis» (565 تا 570 میلادی) در نزدیکی پاریس کشف شده است. در «حدودالعالم» آمده است: «و اندر دریای خزران ( یعنی دریای خزر رضوان ) دو جزیره است، یکی برابر دربند خزران است آن را جزیرة الباب خوانند از آنجا رومن خیزد که به همه جهان ببرند و رنگرزان از آن به کار برند.»5
همچنین «ابن حوقل» می نویسد: «و جزیرهﻯ بزرگ دیگری رو به روی رود کر و نزدیک باب است. این جزیره نیز بیشه ها و درختان و آبها دارد و از آن روناس به دست می آید و به همین سبب گروهی از شهر بردعه ( بردع ) بدانجا آمده، مدتی به تهیهﻯ روناس می پردازند، و آن را به ورهان و بردعه می برند و از آن بهره مند می شوند.»6
در گذشته در ژاپن هم از گیاه روناس ژاپنی برای تولید رنگ قرمز استفاده می شد، ولی به مرور زمان استفاده از آن ترک گشته است.
روناس در جنگهای صلیبی بار دیگر به اروپا آمد و به قرمز تركی معروف شد ، هلندی ها یكی از تولیدكنندگان روناس بودند، همچنین آثاری از گیاه روناس در یک کارگاه رنگرزی واقع در «یورک York» مربوط به قرن دهم میلادی یافت شده است.
«ویکتوریا افشار» عقیده دارد: «این بوته نخستین بار توسط سودا گران عرب به اسپانیا و برای دومین بار پس از قرون وسطی توسط اهالی جلفای اصفهان به اروپا برده شد.»7
بازرگانی ونیزی که در سال 913 ﻫ. ق. در ایران ساکن بوده است می نویسد: «در این شهر [خوی] رنگ سرخ لاکی به مقدار فراوان میسازند و آن را از ریشه های سرخی فراهم میکنند که در زیر زمین است و با بیل و کلنگ بیرون می آورند و سپس به هرمز میفرستند و از این ریشه ها برای ساختن و به کار بردن رنگ سرخ در غالب نقاط هندوستان بهره می جویند.»8 گیاه بیان شده همان روناس می باشد. «ویکتوریا افشار» می گوید: «صدور روناس از آذر بایجان به هندوستان به احتمال زیاد یا به دلیل کافی نبودن و یا پایین بودن کیفیت رنگ آنها بوده است.»9
«rose madder» یك رنگ هنری روی بشقابها توسط اساتید از زمان رنسانس تا كنون بوده است. «madder» نام تجاری روناس در اروپاست.
«شاردن Chardin» در سفرنامه اش به فراوانی این گیاه در ایران اشاره کرده و عنوان می کند که از این گیاه برای رنگرزی و نقاشی استفاده می شود. 10
به گفتهﻯ «ویكتوریا افشار» رنگ روناس در هر منطقه از ایران نامی متفاوت دارد، برای مثال به آذری «بویاخ» نامیده می شود که به معنی رنگ كردن خامهﻯ قالی است؛ در مناطق دیگر هم نامهای دیگری دارد که این امر نشان دهندهﻯ قدمت این رنگ در ایران و خاورمیانه است.
![]()
به کوشش شرکت سهامی فرش و شرکت چیدمان اُسکار، نمایشگاهی در محل کارخانجات شرکت سهامی آماده شده که در آن سعی شده بین فرش های دستباف و مبلمان مدرن، از نظر طرح و رنگ هماهنگی ایجاد شود که انصافاً هم در این کار موفق بوده اند. به گفته ریاست شرکت فرش، «تصور عموم مردم بر این است که فرش با طرح های سنتی فقط با چیدمان کلاسیک قابل هماهنگی است و این نمایشگاه با هدف پاک کردن این ذهنیت برگزار شده است.»
البته بیشتر فرش های به کار رفته در این نمایشگاه از نوع گبه هستند، ولی تعداد قالی های سنتی هم کم نیست. تعداد 30 تصویر از این نوع چیدمان در صفحه ای جداگانه قابل دسترسی می باشد که با کلیک بر روی لینک این بخش در پایین همین مطلب می توانید گوشه ای از این چیدمان ها را مشاهده نمایید.
ارامنه ای که در ایران به قالیبافی می پرداختند ، علاقه زیادی به رنگ های سیر با فام تیره داشتند. در زمان شاه عباس صفوی ،با توجه به این موضوع ، شاه دستور داد گیاه «گل شار» را که رنگ های سیر تولید می کند و خاص مناطق شرقی ایرانی است را به غرب (منطقه فریدن) آوردند تا ارامنه از آن استفاده کنند.![]()
در فرش های ارمنی - بر خلاف فرش های اصیل ایرانی – از رنگ صورتی استفاده شده است این رنگ معمولا از قرمزدانه ( که شیدهای صورتی روشن تا بنفش تیره را تولید می کند ) به دست می آید. گونه ای از قرمزدانه در ارمنستان یافت می شود که در منابع تاریخی از آن یاد شده است، برای مثال در «حدود العالم» آمده است : « دون شهری عظیم است و قصبه ارمنیه است ... از وی کرمی خیزد کی از وی رنگ قرمز کنند.۱ » «ابن حوقل» در «صوره الارض» در مورد همین شهر «دون» آورده است : « ... و قرمز رنگی سرخ است که بدان پارچه مرعزی ]همان پارچه کرکی [ و پشم را رنگ کنند و اصل آن از کرمی چون کرم ابریشم است که دور خود می تند.۲ » همچنین «مقدسی» در «احسن التقاسیم» و «یعقوبی» در«البلدان» در مورد قرمزدانه ی ارمنی توضیحاتی داده اند . در ارمنستان این رنگ را Vortan karmir می نامند.
همچنین ارامنه از رنگ قرمز دیگری که از گیاه «تورون» (مارنا) ] Toron (Marena) [ به دست می آید ، استفاده می کردند. امروزه در قالی های ارمنی باف از رنگ های قرمز روشن و آبی استفاده زیادی می شود، رنگ های طلایی و سبز هم معمولا به کار می روند ولی رنگ قهوه ای تیره به ندرت کار می رود.
1. به کوشش منوچهر ستوده، حدود العالم من المشرق الي المغرب، انتشارات دانشگاه تهران، تهران، 1340 ، ص 159 .
2. ابن حوقل، صورة الارض، ترجمه جعفر شعار، انتشارات بنياد فرهنگ ايران، تهران ، 1345 ، ص ۹۰ .
هنر رنگرزی در اروپا با شروع دوران مسیحیت به طور چشمگیری گسترش یافت. راهبان در طی قرون وسطی فرهنگ کاربرد رنگهای گیاهی را به زیبایی ثبت کردند. در این زمان تقریباً تعداد محدودی رنگزا وجود داشت و رنگرزان اروپایی نیازهای خود را از خاور دور و نزدیك تامین می كردند. « ونیز ... مرکزی برای ورود کالاهای رنگی شرق گردید... مواد رنگی، که تجارتش رونقی روز افزون داشت، به شهرهای مدیترانه ای فلورانس، پیزا و جنوا صادر می شد... شهرت رنگرزان اروپایی که از قرن دهم شروع به شکوفا شدن کرده بود، در قرن سیزدهم به اوج خود رسید.» ۱
بین سالهای « 1153- 1124» رنگرزان در اسکاتلند تحت قوانین مستقیم «دیوید اول» قرار داشتند. رنگرزی فرانسه در قرن سیزدهم و انگلستان در قرن چهاردهم با گسترش صنعت نساجی ، از اهمیت ویژه ای برخوردار گشت. «ژنو»، «باسل» و «فرانکفورت» از بازارهای بزرگ برای تجارت مواد رنگی در اروپا طی این دوران بودند.
طی قرون پانزدهم و شانزدهم با كشف یك نوع رنگزای طبیعی در آمریكا این كشور نیز به منابع تأمین مواد رنگزا اضافه شد و درست در همین دوره بود كه اسپانیا و پرتقال به دلیل كشف یك درخت در آمریكای جنوبی كه می شد از آن رنگ قرمز خیلی عالی به دست آورد در كار رنگرزی زبانزد شدند. البته این درخت در قرن سیزدهم برای اهالی جزایر «Anderman» آشنا و به نام «Sappon» معروف بود كه در آمریكای جنوبی «Brazil» نامیده می شد؛ به همین دلیل پرتقالی ها این منطقه را كه محل كشت «Brazil» بود به همین نام، نامیدند و بعدها این كشور به نام برزیل معروف شد.
«شگردهای رنگرزی ترکیه که سالیان سال به عنوان راز حرفه ای نگه داشته می شد، در سال 1747 به اروپا رسید.» ۲
استفاده از مواد رنگرزی طبیعی حاصل از گیاهان (ریشه, ساقه, برگ, گل, میوه و دانه) و حشرات و صدف های دریایی در دربارهای سلطنتی تا قرن نوزدهم ادامه داشت. در سال 1856، یک دانشجوی شیمی به نام «ویلیام هنری پرکین William Henry Perkin» روش جدیدی در رنگرزی، با استفاده از «آنیلین Aniline» را کشف کرد. در این زمان با گسترش یافتن علم شیمی رنگ، رنگهای طبیعی به تدریج جای خود را به رنگهای شیمیایی دادند.
منابع و مآخذ
اوکتایی - ناصر - « هنر رنگرزی با گیاهان » - دفتر نشر خودکفایی - تهران - 1363.
جهانشاهی افشار - ویکتوریا - « فرایند و روشهای رنگرزی الیاف با مواد طبیعی » - انتشارات دانشگاه هنر - تهران - 1380.
ژوله - تورج - « پژوهشی در فرش ایران » - انتشارات یساولی - تهران - 1381.
نصیری - محمد جواد - « سیری در هنر قالیبافی ایران » - ناشر: مؤلف - تهران - 1372.
Cannon - John, Margaret - "Dye Plants and Dying" - Herbert Press -
عبدی، یمینی مهر - امیر، احسان - پایان نامه « رنگرزی الیاف پشم و ابریشم با قرمزدانه » - جهاد دانشگاهی اردکان- 1383
توفیقی - روفیا - « گیاهان رنگزا - اسپرک » - صنعت نساجی - شمارهﻯ 267.
از 1700 سال قبل از میلاد مسیح، ساکنان اطراف مدیترانه از پوست تنه بلوط، رنگ تهیه می کردند. تعداد مواد رنگزای طبیعی در دسترس خیلی وسیع نبوده است و برای به دست آوردن تنوع، رنگرزان از املاح فلزات استفاده می كردند. مصریان و یونانیان علاوه بر رنگزاهای متداول، از ریشه گیاهی به نام «آلکانت» برای ایجاد رنگ قرمز استفاده می کردند که در 1300 سال پیش از میلاد از جزیره قبرس خریداری می شده است.
پاپیروسهایی متعلق به قرن سوم پیش از میلاد یافت شده اند که یکی از قدیمی ترین نسخ رنگرزی است که از آنها به عنوان دائرة المعارف رنگرزی یاد شده است. همچنین در نزدیکی اهرام مصر هم بقایای یک کارگاه رنگرزی به جا مانده است؛ « این کارگاه دو اتاق جداگانه داشته که یکی برای رنگرزی و دیگری جهت شستشوی الیاف استفاده می شده و کلاف های رنگ شده را در پشت بام خشک می کرده اند.»۱
از نوشته های کهن هند چنین پیداست که رنگرزان آن دوره، طبقه و صنف معینی بوده اند و کار رنگرزی و شستشوی پارچه و لباسهای مستعمل را به عهده داشته اند. آنها از انواع رنگ زرد استفاده می کرده اند و چگونگی به دست آوردن رنگ قرمز از پوست درخت های خاص را می دانستند. در این نوشته ها، توضیحاتی در مورد تثبیت رنگ آبی به دست آمده از «نیل» بر روی پنبه هم آمده است.
در حفاری های شهر «پمپی» و «هرکولانیوم» تعدادی کارگاه رنگرزی متعلق به سال 79 میلادی کشف شده است. دو نفر که در همین زمان می زیسته اند اطلاعات مهمی از رنگزاهای آن دوران را به ثبت رسانده اند، یکی از آنها « دیوس کوریدس Dioscorides » فیزیکدان یونانی و دیگری « پلینی Pliny » طبیعی دان رومی است. طبق نوشته های این دو نفر، از روناس و قرمزدانه برای رنگ قرمز، زعفران و اسپرک برای رنگ زرد، وسمه و نیل برای رنگ آبی استفاده می شده است. همچنین از گیاهان و موجودات فراوانی همچون حلزون ارغوانی، پوست گردو، پوست بلوط، گل پر طاووس، گل انار، گل گاوزبان و ... نام برده اند.
تاریخ رنگرزی به طور دقیق مشخص نیست ولی «مرتضی راوندی» عقیده دارد انسانهای اولیه « پس از تهیه لباس، از خاک های رنگین یا عصاره گیاهان و میوه ها موادی به دست آوردند و جامه ها را با آن رنگ کردند و به این ترتیب لباس رنگی مخصوصی برای فرمانروایان درست شد و هنر رنگرزی نیز در خدمت بشر قرار گرفت۱.» نساجی و بافندگی در هر منطقه نشان از وجود الیاف خودرنگ و یا رنگ شده دارد و در هر جا اثری از نساجی باشد رنگرزی هم انجام می شده است.
عقیده دانشمندان بر این است که : «شناخت انسان از رنگ حداقل به سه تا چهار هزار سال پیش از میلاد مسیح بر میگردد. شاید انسانهای نخستین هنگام غارنشینی و استفاده از میوه ها و گیاهان به رنگ بعضی از میوه های وحشی - همچون آلبالو و شاه توت- پی برده و از آن برای رنگ کردن نقش و تصویر جانوران مورد علاقه یا دیوار محل سکونت و بدن خود استفاده کرده باشند.»۲
«سومری ها در 3500 سال قبل از میلاد مسیح در آشور ساکن شدند. یکی از لوحه های سفالی کشف شده متعلق به آن دوره فهرستی از احتیاجات یک کدبانوی خانه، به لباس را در بردارد که نشان می دهد، پارچه های آن دوره به رنگهای گوناگون رنگ می شده است.»۳
در آثار مکتوب به دست آمده از چین چگونگی رنگرزی ابریشم در 2600 سال پیش از میلاد مسیح بیان شده است و توضیح داده شده که چگونه رنگ های زرد، قرمز و سیاه را روی ابریشم بیاورند.
گفته می شود که پارچه های رنگ شده كه از مكان های مقدس در مصر بدست آمده مربوط به 2500 سال قبل از میلاد مسیح است. طبق مطالعاتی كه شده معلوم گردیده است كه این هنر از مناطق باختر و از هند به سایر نقاط جهان كشانده شده و انگیزه آن لكه های بجا مانده از آب میوه روی پارچه كه بطور تصادفی پیش آمده بوده است.
شواهدی نشان می دهد که عملیات رنگرزی در 2000 سال پیش از میلاد مسیح در اطراف دریاچهﻯ «زوریخ» انجام می شده است. در برخی از نقاط اطراف دریای مدیترانه كه احتمالاً مسكونی بوده آثاری از تور، طناب، نمد و نخ های تابیده پرزدار عمدتاً كتانی با رنگ آبی رنگ شده یافت شده است. قطعه ای از پارچه ای ضخیم مربوط به هزاره دوم قبل از میلاد در دست است كه احتمالاً متعلق به چادری مقدس (معبد) بوده و زرد رنگ است. در منطقه ای كه این پارچه یافت شده (در سواحل مصر) مقادیری پارچه كتانی و بافته های دیگر به دست آمده است كه نشان از تجاری بودن منطقه دارد. از 1700 سال قبل از میلاد مسیح، ساکنان اطراف مدیترانه از پوست تنه بلوط، رنگ تهیه می کردند.
به سلامتی انتخابات انجمن علمی فرش دانشکده فرش اردکان برگزار شد و هر ۵ عضو اصلی هم از بچه های رنگرزی هستن...
صبا راستی - ناصر شکاری - حبیب الله سالاری - محسن زین العابدینی - سیما ساعدی
البته ۲ تا عضو علی البدل هم از بچه های طراحی هستن که عبارتند از آقایان محمد امین عدلخواه و یاسر معصومیان.
البته باید بگم که متأسفانه دانشجوهای رنگرزی در روز انتخابات کم لطفی کردن و برای انتخابات حضور کمرنگی داشتن و عجیب تر اینکه دوستان گرایش های دیگه در رأی گیری به کاندیداهای گرایش رنگ رأی دادن و بعد از انتخابات اعتراض کردن که چرا همه اعضای اصلی از رنگرزی هستن!!!
وقتی که از ۱۲ نفر کاندیدای انتخابات , ۵ نفر رنگرزی هستند و بیشتر رأی های داده شده توسط دانشجوهای غیر رنگرزی بوده و در آخر هم همین ۵ نفر انتخاب شده اند , این کم لطفی دوستان معترض رو میرسونه. در ضمن در تبلیغات انتخاباتی تمام کاندیداها شنیدیم که به گرایش خاصی اشاره نشد و همه دوستان سعی در بهتر شدن کلی وضع علمی دانشگاه دارند.
به هر حال به همه دوستان تبریک میگم و تقاضا دارم که همونطور که خودشون در تبلیغاتشون گفتن فارغ از گرایششون , تلاش کنند که دانشگاه به روزهای اوج خودش برسه.
یاسمن چمن خورشید